देश की बुनियाद का निर्माण गुरू-शिष्य परंपरा द्वारा ही संभव है – डाॅं0 अरूण कुमार

0
176

देश की बुनियाद शिक्षक परंपरा से होती है – डाॅं0 अरूण कुमार
अजय कुमार पाण्डेय
नई दिल्ली। डाॅं0 अरूण कुमार के दिल्ली स्थित् आवास पर चुनाव के मुद्वे पर चर्चा के दौरान पत्रकार ने जब पूछा कि चुनाव के वक्त ही विभिन्न पाॅंलिटिकल पार्टी के नेताओं द्वारा जाति, धर्म, मंदीर – मस्जिद्, आरक्षण के नाम पर राजनिति प्रारंभ कर दंगे क्यों फैलाए जाते हैं। तब जवाब देते हुए कहा कि आज सकारात्मक राजनिति का दौर खत्म हो गया है। झुठ बोलने का दौर है। पिछले 25 – 30 वर्षों से शुरू हुआ है। पहले नेता या राजनित के कार्यकर्ता उतना ही बोलते थे जो करते थे। अपवाद् स्वरूप एकाध ब्यक्ति झुठ बोलते थे। नतीजतन् न नेता का जनता पर, न जनता का नेता पर विश्वास है। ऐसी स्थिति में भावनात्मक मुद्वे ही चुनाव में भॅंजाए जाते हैं। जनता उसी फाॅंस में फॅंसती है। सकारात्मक सवालों पर चुनाव नही होता है। जब संवाद्दाता ने पूछा कि ऐसे ब्यान देने वाले नेताओं पर कानूनी रूप से उचित् कार्रवायी क्यों नही की जाती। अधिकांश मामले ऐसे देखे जा रहे हैं कि अदालत् से भी जमानत् मिल ही जाती है। तब कहा कि पहले लाॅं आॅंडर के लिए बनता था। अब आॅंडर के लिए लाॅं बनता है। भीड़ के हिसाब से लाॅं बनती है। कानून की धज्जियाॅं उडा़ई जा रही है। इस अराजकता का कारण शिक्षकों का अभाव है। इस देश की बुनियाद् शिक्षक परंपरा से होती है। प्रभू श्रीराम् को वशिष्ठ, विश्वामित्र ने बनाया था। मुनी अगस्तय् ने सृजन किया था। प्रभू श्रीराम्, लक्षुमण दोनों बेटे अपने पिता के काफी प्रिय थे। गुरू ने दोनों पुत्रों को माॅंग लिया। विश्वास पर गुरू ने उचित् मार्गदर्शन दिया था। कालखण्ड में उसे त्रेता कहते हैं। अब राजसता से शिक्षा चलता हो तो क्या होगा? उस वक्त एकलब्य का अंगुठा माॅंग लिया जाता है। द्रोणाचार्य कम जाने जाते हैं परंतु एकलब्य अधिक जाने जाते हैं। आजादी के दौरान आजाद कराने में शिक्षकों का अहम् भूमिका रहा। अगली पंक्ति में थे शिक्षक। इसलिए शिक्षक को राष्ट्र निर्माता कहा गया। 25 – 30 वर्षों में सता ने शिक्षकों को अमर्यादित् करने का काम किया। गुलाम, कुंठा के शिकार हो गए। तब कुंठित पिढी़यों का जन्म होने लगा। जिस देश का नागरिक रोटी का गुलाम हो जाए तो वह राष्ट्र जिवंतता को खोता है। नतीजतन् विवेकानंद पैदा होना बंद हो जाता है। पटेल, मौलाना आजाद् भी बनना बंद हो जाता है। शिक्षक आज भी राष्ट्र निर्माता कहे जाते हैं परंतु राजसता, सांसद्, विधायक के दरवाजे पर अपनी छोटी कामों के लिए भी ऐड़ियाॅं घसीटते दिखते हैं। पहले शिक्षक से राजसता आशिर्वाद प्राप्त करता था। अब राजसता से शिक्षा चलता है। समाज कमजोर हुआ है। समाज पर ब्यक्ति का नियंत्रण होता था। चाहे कितना भी ताकतवर क्यों न हो? लेकिन आज ब्यक्ति से समाज डर रहा है। कारण पूॅंजी डोमिनेन्ट समाज बन गया है। विचार डोमिनेन्ट समाज नही रह गया है। सारी बिमारियों का जड़ यही है। विचार निर्देशित् समाज और राष्ट्र का प्रणेता बनाया था। एक सशक्त राष्ट्र निर्माण के लिए पुनः शिक्षकों को सम्मानित करना होगा। राजसता एवं समाजिक सता को शिक्षक को पूर्ण मान – सम्मान देना होगा ताकि बंद कमरे में भी शिक्षक अपने शिक्षकत्व का क्षरण न होने दें। इसी पूॅंजी से राष्ट्र निर्माण संभव है। राजसता पूॅंजीपतियों की शरण से बाहर जाए शिक्षकों के शरण में। विकास का मजबूत हथियार है ज्ञान न कि पूॅंजी। पूॅंजी आवश्यक है जीवन के लिए। लेकिन ज्ञान से नियंत्रित पूॅंजी न हो तो वह अराजकता को जन्म देता है। ज्ञान के अभाव में पूॅंजी सर्वशक्तिशाली बन गया है जो संपूर्ण अराजकता का कारण है। आज जितना श्रममेव जयते सब दिवार पर दिखते हैं परंतु यर्थाथ पूॅंजीमेव जयते। मजबूत भारत निर्माण के लिए जब श्रममेव जयते होगा तभी सत्यमेव् जयते सार्थक होगा। स्वभाव से भ्रष्ट नही, परिस्थितियाॅं भ्रष्ट बना देती है।
अंत् में जब पूछा कि आप आगामी लोकसभा चुनाव किस पार्टी से लडें़गे? तोे कहा कि महागठबंधन से बात चित चल रही है। एन0डी0ए0 का तो सवाल ही नही या अपने ही पार्टी से चुनाव लडें़गे।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here