एक देश, एक शिक्षा निति लागू हो – डाॅं0 नीलम

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एक देश, एक शिक्षा निति लागू हो – डाॅं0 नीलम
अजय कुमार पाण्डेय
औरंगाबादः ( बिहार ) औरंगाबाद जिला के् बारून प्रखंड निवासी डाॅं0 नीलम काराकाट लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ना चाहती है। किसी पार्टी के टिकट पर चुनाव लडे़गी या निर्दलीय स्पष्ट नही हो पाया है। जब संवाद्दाता के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि जब देश, मे एक शिक्षा निति होगी तभी देश,का विकास संभव है। सरकारी विधालय मे कमजोर वर्ग के बच्चे हीें पढ़ने जाते हैं जबकी आर्थिक-संपन्न परिवार अपने बच्चों का एडमिशन प्राईवेट विधालयों में कराते है क्योकी सरकारी विधालय में किस ढंग की पढा़ई होती है यह भी छुपी हुई नही है। देश, की भावना तो यही से प्रारंभ होता है। जब पूछा कि चुनाव प्रारंभ होने से पूर्व ही किसी भी पाॅंलिटिकल पार्टी के बड़बोलेपन नेताओें द्वारा मंदीर, मस्जिद्, जाति, धर्म, आरक्षण, क्षेत्रवाद के नाम पर अनाप – शनाप ब्यान क्यों देने लगते है्रं? तब कहा कि अधिकांष ऐसे लोग सिर्फ चर्चा मे रहने के लिए करते हैं। साथ ही कहा मेरे पास तो कई ऐसे लोग आए हैं जिनसे मैं पूछा कि आप कितने वर्सों से पार्टी के लिए काम कर रहे हेैं। तब कहा कि लगभग 18 वर्स की उम्र से ही पार्टी के लिए कार्य कर रहा हूॅं। तब मैं कहा कि लगभग आपका वर्तमान उम्र तो 50 वर्स हो गया। ऐसे पार्टी के नेता अधिकांष राजतंत्र बनाए रखने की सोंच रखने वाले लोग सिर्फ यूथ लोगों को पार्टी का झंडा ढुलवाकर पूरे जिंदगी का कैरियर बर्बाद करने का ही काम किया।
मुस्लिम् बच्चों पर भी चिंता जाहिर करते हुए कहा इस समाज के बच्चे शिक्षा प्राप्त करने की उम्र से ही रोजगार करना शुरू कर देते हैं। जबकी मुस्लिम् परिवार को भी चाहिए कि अपने बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए जागरूक करें। परंपरा बदलने की जरूरत है। तभी असली विकास संभव हो पाएगा। आरक्षण के मुद्वे का जवाब देते हुए कहा कि सरकार को चाहिए कि देश में आरक्षण निति समाप्त हों। ऐसा नही है कि स्वर्ण जाति में लोग गरीब नही हैं। सरकार द्वारा चलाई जा रही फ्री योजना के बजाय शिक्षा निति केें सुधार पर बल दे। सरकार को चाहिए कि ठोस निर्णय लेते हुए देशहित् में उचित् ब्यवस्था बनाए। देश के संविधान से जात – पात हटाकर सिर्फ एक भारतीय के नाम से जानें जाएॅं। देश का एक बच्चा बादाम खाएगा और दूसरा सुखी रोटी, आखिर ऐसा क्यों? जब पूछा कि प्रधानमंत्री मोदी जी ने स्वर्णों को भी दस प्रतिषत् आरक्षण देने की घोषणा कर दिए। स्वर्ण आरक्षण के मामले में पात्रता भी आठ लाख रूपया प्रति वर्ष से कम आमदनी करने वाले को मिला है। क्या आठ लाख रूपया की वार्षिक आमदनी कम होती है? इसके अलावे मिडिल क्लास के लोग भी कहाॅं जाएॅंगे? इससे बेहतर तो होता कि समाज के अंतिम् पंक्ति में खडे़ स्वर्ण जाति के लोगों को भी उचित् सर्वे कराकर ही संसद् में कानून संसोधन कर आरक्षण निति क्यों नही बनाई गई और सर्वे के दौरान सरकार को गलत रिर्पोट पेश करने वाले दोषी लोगों पर भी न्याय संगत् उचित् कार्रवायी करने का क्यों न संविधान बनाया जाए?
दूसरा पहलू यह भी है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भी पूर्व में ही कह चुका है कि पचास प्रतिषत् से अधिक आरक्षण नही दिया जा सकता। वर्तमान 49ः5% सरकार द्वारा आरक्षण दिया भी चुका है। तब कहा कि या तो उचित् सर्वे कराकर ही संसद् में बिल पेष किया जाता या आरक्षण बिल्कुल ही समाप्त कर दिया जाए तो बेहतर होगा। देषवासियों में द्वेश की भावना ही खत्म हो जाएगी। देष के अंदर बिना पढे – लिखे चुनाव जीतकर जनप्रतिनिधि बनने वाले लोगों पर भी चिंता जाहिर करते हुए कहा कि ऐसे लोग पंचायत् जनप्रतिनिधि बनकर या विधानसभा, लोकसभा में पहुॅंचकर ही क्या करेंगे? संवाददाता द्वारा पूछे गए सवालों का सम्र्थन करते हुए कहा कि आपका कहना सही है। इसके लिए भी संविधान में संषोधन कर लागू करने की जरूरत है। महिलाओं की अधिकार पर भी जोर देते हुए कहा कि बेटी को भी माॅं – बाप की संपति में अधिकार मिलना चाहिए। तभी वास्तव में ससुराल में भी बेटीयों को कोई प्रताड़ित नही करेगा। सरकार को चाहिए कि महिलाओं के प्रति सम्मान का भाव तभी आएगा। जब समाज के बीच नैतिकता भी सिखाई जाए। महिलाओं को भी पाॅंलिटिक्स में वास्तविक हक देकर विधानसभा, लोकसभा में भेजा जाए। बिहार के ष्षराब बंदी मुद्वे पर भी पूछे गए सवालों का जवाब देते हुए कहा कि बिना प्लेटफार्म तैयार किए हुए शराब बंदी तो कर दी गई। लेकिन बिहार में क्या हश्र हुआ? मैं यही कहना चाहूॅंगी कि भारत में अधिकांष पार्टी के लोगों का नियत सही नही है। सर्वप्रथम इसे सुधारने की जरूरत है।
संस्कृत विषय पर भी चर्चा करते हुए कहा कि इससे बेहतर कोई विषय ही नही है। संस्कृत भाषा मृदृल के साथ वैदिक रिवाज सिखाने में भी अहम् रौल निभाता है। आज भारतवर्ष की पुरानी सभ्यता को अन्य देष अपना रहा है परंतु दुर्भाग्य है कि भारतवर्ष के लोग ही पश्चिमी सभ्यता अपनाने को आतूर हैं। इसे भाषा, परंपरा को बचाने की जरूरत है।jvj

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